Tuesday, June 12, 2012
भ्रर्म क्या चीज होती है
Monday, May 9, 2011
अजीबो गरीब ब्लॉग
(चित्र सयोंजन गूगल image )
पता नहीं क्यों,लिखने को मन नहीं करता,
ऑफिस से घर जाओ तो,ब्लॉग खोलने को जी है, अखरता.
अब पहले जैंसी बात नहीं रही, इस ब्लॉग जगत में,
कोई भेद नहीं रहा, लेखन के देवता और भगत में.
पहले हम अच्छे लिखने वालो को,हर दिन खोजा करते थे.
कमेन्ट लिखेने के लिए भी, घंटो सोचा करते थे,
प्रिय, आदरनीय कहकर, दूसरे को सम्भोदित करते थे,
अपने से अच्छा, दूसरे के लेख को घोषित करते थे,
याद है मुझे, जब ब्लॉग में, दो पुराने लेखको की लड़ाई हुई.
हम सब को ऐंसे लगा, जैंसे हमारी जग हँसाई हुई.
पहले सब नए लेखको का ,सम्मान करते थे.
पहले सब नए लेखको का ,सम्मान करते थे.
कुछ प्रॉब्लम हो जाये तो साथ मिल कर समाधान करते थे.
अब तो लोग बस, नाम के लिए दूसरे को पढ़ते है.
और कुछ शब्द पढ़ कर, "बहुत खूब'' लिख, चल निकलते है.
ब्लॉगजगत की ये हालत देख, मन बहुत दुखता है,
पता नहीं क्यों,लिखने को मन नहीं करता है,
ऑफिस से घर जाओ तो,ब्लॉग खोलने को जी है, अखरता........(२)
अब तो पुराने लेखको ने, ब्लॉग को, अघोषित अलविदा कह दिया.
और ज्यादातर ने अपने, कमेन्ट के थेले को सी दिया,अब तो लोग बस, नाम के लिए दूसरे को पढ़ते है.
और कुछ शब्द पढ़ कर, "बहुत खूब'' लिख, चल निकलते है.
ब्लॉगजगत की ये हालत देख, मन बहुत दुखता है,
पता नहीं क्यों,लिखने को मन नहीं करता है,
ऑफिस से घर जाओ तो,ब्लॉग खोलने को जी है, अखरता........(२)
Tuesday, February 22, 2011
पापा, में पापा बन गया,
११ अक्टूबर की रात में,
कोई नहीं था, साथ में,
अचानक, बीबी का फ़ोन आया,
फ़ोन में खबर सुनी तो, में घबराया,
पत्नी को, पेट में दर्द सता रहा था,
और में ऑफिस में था,इसलिए घबरा रहा था,
पत्नी के साथ कोई नहीं था,क्यों की delivery डेट, २ नवम्बर की थी,
और काफी दिन पहले, दर्द हो रहा था, ये बात बहुत भयंकर थी.
में कमरे में जाने को तुरंत निकला.
कठोर दिल मेरा,मोम जैंसा पिघला.
कुछ कोस की दूरी मुझे, कई मील की लग रही थी,
कई कुछ गलत न हो जाये, ये भावना अन्दर चुभ रही थी.
घर पहुचते ही में, पत्नी को लेकर, अस्पताल गया,
डॉक्टर के कमरे में जाते-जाते, मेरी आँखों में आंसू का सैलाब बहा,
फिर अपने आप को, संभाल कर, डॉक्टर की बात को सुना,
वो बोली,आपके होने वाले बच्चे के लिए, बिधाता ने आज का दिन है चुना.
फिर इन्तजार करते-करते वो घडी आई,
सबसे पहले नर्से बहार आकर,मुझे देख मुस्काई,
भगवान के द्वारा,हमें भेजा उपहार, बच्चे के रूप में डॉक्टर, बहार लायी.
मेरे हाथ में पकड़ा कर बोली, बधाई हो बधाई,
मेरी आँखे खुशी से छलक आई.
आज आपसे मेने, अपनी, उस दिन की, बात की है,
और अपनी पत्नी अंजलि को, धन्यबाद देने के लिए, ये कविता सौगात दी है,
Wednesday, January 12, 2011
जब रोम(भारत) जल रहा था, तो नीरो (मनमोहन) बंसी बजा रहा था.
मंत्री यहाँ, घोटालों का व्यापारी बना है.
पी.ऍम हमारा, गांधारी बना है.
''आदर्श'' सी.ऍम, विधवाहो का घर लूटता है.
कुछ भी मांगो तो, तो जनता पर पुलिश का कहर, फूटता है.
कैंसा ये शोर, मचा है.
लूटने को, अब इस देश में, क्या बचा है?
अब तो छोड़ दो, इस ''भारत'' को.
कब तक सहंगे इस, ''जलालत'' को.
भरोशा कर, तुम नेताओं को सत्ता दी है.
पर लगता है, तुमने तो मदिरा पी है.
तभी तो मध्होसी में, उलटा सीधा बोल रहे हो.
सोच भी नहीं सकता जो, ऐंसे घोटाले, खोल रहे हो.
वाह मान गए, "तुम" बैमानो को.
समझते तो पहले भी थे, तुम शैतानो को.
बस, तब हम चुप रहते थे.
सब कुछ हंस कर, सहते थे,
सोचते थे कि देश हमारा, सोने की खान है,
कुछ नहीं था, फिर भी कहते ''मेरा देश महान है''
महान तो अब भी है, पर तुम्हारे कारण शर्मसार है.
अब समझा में, राजनीती सेवा नहीं, ब्यापार है,
Wednesday, December 15, 2010
तुम कौन हो?

तुम कौन हो?
जो मुझे जगाती हो,
तुम कौन हो?
जो मुझे जगा, खुद खो जाती हो,
तुम कौन हो?
आँखों में पानी कि तरह, छलक आती हो.
तुम कौन हो?
जो हर पल, साथ मेरा निभाती हो.
तुम कौन हो?
जो मुझ में लगने वाले आरोप, ख़ुद सह जाती हो,
तुम कौन हो?
जो मुशकिल समय में, मुझे समझाती हो,
तुम कौन हो?
जिसे में श्रेय नहीं देता, फिर भी खुश हो जाती हो ,
तुम कौन हो?
जो मुझे कमझोर छण में, ताकत दे जाती हो.
तुम कौन हो?
जब ये पुछा, मेने सबसे
उत्तर सुनकर, सोच रहां हूँ में तबसे,
क्योंकि कोई तुझे बहम, कोई कहता, हवा है.
कोई कुछ भी कहे,मुझे पता है, माँ, ये तेरी दुआ है,
माँ तेरी दुआ है................
तुम कौन हो?
जो मुझे कमझोर छण में, ताकत दे जाती हो.
तुम कौन हो?
जब ये पुछा, मेने सबसे
उत्तर सुनकर, सोच रहां हूँ में तबसे,
क्योंकि कोई तुझे बहम, कोई कहता, हवा है.
कोई कुछ भी कहे,मुझे पता है, माँ, ये तेरी दुआ है,
माँ तेरी दुआ है................
Tuesday, November 23, 2010
गद्दारी धार्मिक नहीं होती है .

यह कविता मेने बहुत पहले लिखी थी, लेकिन फिर से रवि इन्दर सिंह का
प्रकरण के बाद, दुबारा प्रकाशित कर रहा हूँ.
माधुरी गुप्ता (और अब रवि इन्दर सिंह) की खबर, कल मेने अखबार में पढ़ी.
भावनाए आक्रोश की, अन्दर ही अन्दर इस तरह गढ़ी,
की सबकुछ कम लगने लगा.
हर आई ऍ एस ऑफिसर गदार दिखने लगा.
फिर माँ की, पांचो अंगुली सामान नहीं, वाली बात याद आ गयी.
और पता नहीं किस का, लेकिन क्रोध मत करो, वाली वाणी, मन को भा गयी.
फिर सोचा वो कौन सी मज़बूरी थी, जिससे वो गदार हो गए?
ऐंसा क्या दिया पाकिस्तान ने, जो उनके कदर दार हो गए?
क्यों की गद्दारी का तमका तो, कुछ पार्टियों ने, कुछ बिशेष धर्म वालो को दिया है .
आज हिन्दू और सिख धर्म के गदार निकल गए,
तो अब क्यों उन्होंने अपना मुख सिया है?
मुझे नहीं पता की इन खबरों में कितनी सचाई है.
पर पीठ तो, बड़े बड़े महपुरशो ने भी दिखाई है.
बस हमें पता नहीं चलता है.
ईमान धर्म देख के नहीं,नियत देख कर बदलता है.
Friday, September 17, 2010
किस बात का खुमार मुझ में है.
किस बात का खुमार मुझ में है.
क्यों गुस्सा बेशुमार मुझ में है.
मिला नहीं अभी तक कुछ, औरअभी से उनसे बिछड़ने के दर्द का गुमार, मुझ में है
सपने, हासिल या अपनाना तो दूर कि बात है.
उनसे तकरार मुझ में है.
गम से राफ्ता रहा, मेरा हरदम
और खुशियों के लिए बेकरार दिल, मुझ में है,
खता हुई है कही बार मुझसे भी,
पर उन गलती को स्वीकार करने वाला ईमान, मुझ में है.
दिल बहुत दुखी था, इसलिए लिख रहा हूँ.
पर दुःख को कविता लिख कर भुलाने का, ब्यवहार मुझ में है.
किस बात का खुमार मुझ में है.
क्यों गुस्सा बेसुमार मुझ में है
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