बहुत सालो बाद फेसबुक और whatsapp के ग्लैमर की दुनिया को अलविदा कह।अपना सालो पहले बनाया हुआ social मीडिया का ध्यान आया।तो आ गया।पता नहीं कितना बदला ये पता नहीं पर आया ये अच्छा लग रहा।ये ऐंसी ही ख़ुशी दे रहा जैंसे हम बहुत काम के बाद गर्मी की छुटी में गाँव जाते थे।वाह क्या अहसास है।
Sunday, June 18, 2017
Sunday, December 30, 2012
वैसे ही ये बात भी भूल जायोगे।
लो आ गए आप सब, मोमबत्ती जलाए हुए।
अपना सब काम छोड़, ब्यवस्था से सताए हुए।
ऐंसा क्या हुआ कि, सारा आवाम सड़को में उमड़ आया।
दर्द मुझे हुआ और,आंसुओं का बादल तुम्हारी आँखों में घुमड़ आया।
तब तुम कहाँ थे? जब मेरा शरीर ख़तम हो रहा था।
तब तुम कहाँ थे?जब तुम्हारी कथित "आधुनिक" सडको पर मुझ पर सितम हो रहा था।
"मेरा काम नहीं था'', यह कह कर तुम, अपना दामन छुड़ा सकते हो।
हमने नहीं देखा, यह कर कर तुम मुझे, झुठला सकते हो।
पर तब तो, तुम थे,जब गुवाहाटी की सडको पर मुझे, जालिम नोच रहे थे।
मुझे बचाते, मेरा दोस्त मुंबई मे मर गया , तब तुम क्या सोच रहे थे?
में कई वर्षो से समाज की बनायीं हुई "इज्जत" खोकर, अस्पताल में जी रही हूँ।
इन कुछ उदारण से तुम्हे अहसास करा रही हूँ।
कि तब तो तुम होते हो,जब तुम्हारे दोस्त मुझ पर फब्तियाँ कसते है।
तब तो तुम होते हो, जब तुम्हारे पड़ोस का शराबी, हम पर ज्यादतियाँ करते है।
तुम, मुझे रोज टीवी पर उपभोग की वस्तु बना हुआ देख, हँसते हो।
तुम, संस्कार के नाम पर अपने घरो में भी, सिर्फ मुझे ही जंजीरों में जड़ते हो।
अब आ ही गए हो तो, एक अहसान कर देना।
एक और "दामिनी" को ना बनने देना।
पर मुझे पता है, तुम नए साल की ख़ुशी में डूब जाओगे,
और, जैंसा अभी तक तम भूले हो , वैसे ही ये बात भी भूल जायोगे।
..........................................अनूप जोशी .....................................
Wednesday, July 4, 2012
भीड़ ,मेरे आस-पास, आज क्यों है!!
ऐ दिल, चुपचाप और खामोश आज क्यों है.
भीड़ ,मेरे आस-पास, आज क्यों है!!
दिल की बस्ती में उदासी सी छाई है,क्यों
दिवाली के रोज भी, इतनी अंधेरों की खाई है क्यों,
हटते नहीं आँखों से,आँसुओ की बूंदे,
इस जख्म में इतनी गहराई है क्यों,
सबकुछ पास होकर भी,जुंबा पे ''ये काश '' आज क्यों है,
भीड़ ,मेरे आस-पास आज क्यों है,
हर पल, इतनी देर में कटता है क्यों।.
उजाला, मेरी आँखों में चुभता है क्यों,
उम्मीद तेरे आने की,अभी भी बरक़रार है,,
फिर भी तेरे नाम से, सीने में दर्द उठता है क्यों,
अजीब सा तुझसे मिलने का, अहसास आज क्यों है,
भीड़ ,मेरे आस- पास आज क्यों है!!
Tuesday, June 12, 2012
भ्रर्म क्या चीज होती है
Monday, May 9, 2011
अजीबो गरीब ब्लॉग
(चित्र सयोंजन गूगल image )
पता नहीं क्यों,लिखने को मन नहीं करता,
ऑफिस से घर जाओ तो,ब्लॉग खोलने को जी है, अखरता.
अब पहले जैंसी बात नहीं रही, इस ब्लॉग जगत में,
कोई भेद नहीं रहा, लेखन के देवता और भगत में.
पहले हम अच्छे लिखने वालो को,हर दिन खोजा करते थे.
कमेन्ट लिखेने के लिए भी, घंटो सोचा करते थे,
प्रिय, आदरनीय कहकर, दूसरे को सम्भोदित करते थे,
अपने से अच्छा, दूसरे के लेख को घोषित करते थे,
याद है मुझे, जब ब्लॉग में, दो पुराने लेखको की लड़ाई हुई.
हम सब को ऐंसे लगा, जैंसे हमारी जग हँसाई हुई.
पहले सब नए लेखको का ,सम्मान करते थे.
पहले सब नए लेखको का ,सम्मान करते थे.
कुछ प्रॉब्लम हो जाये तो साथ मिल कर समाधान करते थे.
अब तो लोग बस, नाम के लिए दूसरे को पढ़ते है.
और कुछ शब्द पढ़ कर, "बहुत खूब'' लिख, चल निकलते है.
ब्लॉगजगत की ये हालत देख, मन बहुत दुखता है,
पता नहीं क्यों,लिखने को मन नहीं करता है,
ऑफिस से घर जाओ तो,ब्लॉग खोलने को जी है, अखरता........(२)
अब तो पुराने लेखको ने, ब्लॉग को, अघोषित अलविदा कह दिया.
और ज्यादातर ने अपने, कमेन्ट के थेले को सी दिया,अब तो लोग बस, नाम के लिए दूसरे को पढ़ते है.
और कुछ शब्द पढ़ कर, "बहुत खूब'' लिख, चल निकलते है.
ब्लॉगजगत की ये हालत देख, मन बहुत दुखता है,
पता नहीं क्यों,लिखने को मन नहीं करता है,
ऑफिस से घर जाओ तो,ब्लॉग खोलने को जी है, अखरता........(२)
Tuesday, February 22, 2011
पापा, में पापा बन गया,
११ अक्टूबर की रात में,
कोई नहीं था, साथ में,
अचानक, बीबी का फ़ोन आया,
फ़ोन में खबर सुनी तो, में घबराया,
पत्नी को, पेट में दर्द सता रहा था,
और में ऑफिस में था,इसलिए घबरा रहा था,
पत्नी के साथ कोई नहीं था,क्यों की delivery डेट, २ नवम्बर की थी,
और काफी दिन पहले, दर्द हो रहा था, ये बात बहुत भयंकर थी.
में कमरे में जाने को तुरंत निकला.
कठोर दिल मेरा,मोम जैंसा पिघला.
कुछ कोस की दूरी मुझे, कई मील की लग रही थी,
कई कुछ गलत न हो जाये, ये भावना अन्दर चुभ रही थी.
घर पहुचते ही में, पत्नी को लेकर, अस्पताल गया,
डॉक्टर के कमरे में जाते-जाते, मेरी आँखों में आंसू का सैलाब बहा,
फिर अपने आप को, संभाल कर, डॉक्टर की बात को सुना,
वो बोली,आपके होने वाले बच्चे के लिए, बिधाता ने आज का दिन है चुना.
फिर इन्तजार करते-करते वो घडी आई,
सबसे पहले नर्से बहार आकर,मुझे देख मुस्काई,
भगवान के द्वारा,हमें भेजा उपहार, बच्चे के रूप में डॉक्टर, बहार लायी.
मेरे हाथ में पकड़ा कर बोली, बधाई हो बधाई,
मेरी आँखे खुशी से छलक आई.
आज आपसे मेने, अपनी, उस दिन की, बात की है,
और अपनी पत्नी अंजलि को, धन्यबाद देने के लिए, ये कविता सौगात दी है,
Wednesday, January 12, 2011
जब रोम(भारत) जल रहा था, तो नीरो (मनमोहन) बंसी बजा रहा था.
मंत्री यहाँ, घोटालों का व्यापारी बना है.
पी.ऍम हमारा, गांधारी बना है.
''आदर्श'' सी.ऍम, विधवाहो का घर लूटता है.
कुछ भी मांगो तो, तो जनता पर पुलिश का कहर, फूटता है.
कैंसा ये शोर, मचा है.
लूटने को, अब इस देश में, क्या बचा है?
अब तो छोड़ दो, इस ''भारत'' को.
कब तक सहंगे इस, ''जलालत'' को.
भरोशा कर, तुम नेताओं को सत्ता दी है.
पर लगता है, तुमने तो मदिरा पी है.
तभी तो मध्होसी में, उलटा सीधा बोल रहे हो.
सोच भी नहीं सकता जो, ऐंसे घोटाले, खोल रहे हो.
वाह मान गए, "तुम" बैमानो को.
समझते तो पहले भी थे, तुम शैतानो को.
बस, तब हम चुप रहते थे.
सब कुछ हंस कर, सहते थे,
सोचते थे कि देश हमारा, सोने की खान है,
कुछ नहीं था, फिर भी कहते ''मेरा देश महान है''
महान तो अब भी है, पर तुम्हारे कारण शर्मसार है.
अब समझा में, राजनीती सेवा नहीं, ब्यापार है,
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