Wednesday, January 12, 2011
जब रोम(भारत) जल रहा था, तो नीरो (मनमोहन) बंसी बजा रहा था.
मंत्री यहाँ, घोटालों का व्यापारी बना है.
पी.ऍम हमारा, गांधारी बना है.
''आदर्श'' सी.ऍम, विधवाहो का घर लूटता है.
कुछ भी मांगो तो, तो जनता पर पुलिश का कहर, फूटता है.
कैंसा ये शोर, मचा है.
लूटने को, अब इस देश में, क्या बचा है?
अब तो छोड़ दो, इस ''भारत'' को.
कब तक सहंगे इस, ''जलालत'' को.
भरोशा कर, तुम नेताओं को सत्ता दी है.
पर लगता है, तुमने तो मदिरा पी है.
तभी तो मध्होसी में, उलटा सीधा बोल रहे हो.
सोच भी नहीं सकता जो, ऐंसे घोटाले, खोल रहे हो.
वाह मान गए, "तुम" बैमानो को.
समझते तो पहले भी थे, तुम शैतानो को.
बस, तब हम चुप रहते थे.
सब कुछ हंस कर, सहते थे,
सोचते थे कि देश हमारा, सोने की खान है,
कुछ नहीं था, फिर भी कहते ''मेरा देश महान है''
महान तो अब भी है, पर तुम्हारे कारण शर्मसार है.
अब समझा में, राजनीती सेवा नहीं, ब्यापार है,
Wednesday, December 15, 2010
तुम कौन हो?

तुम कौन हो?
जो मुझे जगाती हो,
तुम कौन हो?
जो मुझे जगा, खुद खो जाती हो,
तुम कौन हो?
आँखों में पानी कि तरह, छलक आती हो.
तुम कौन हो?
जो हर पल, साथ मेरा निभाती हो.
तुम कौन हो?
जो मुझ में लगने वाले आरोप, ख़ुद सह जाती हो,
तुम कौन हो?
जो मुशकिल समय में, मुझे समझाती हो,
तुम कौन हो?
जिसे में श्रेय नहीं देता, फिर भी खुश हो जाती हो ,
तुम कौन हो?
जो मुझे कमझोर छण में, ताकत दे जाती हो.
तुम कौन हो?
जब ये पुछा, मेने सबसे
उत्तर सुनकर, सोच रहां हूँ में तबसे,
क्योंकि कोई तुझे बहम, कोई कहता, हवा है.
कोई कुछ भी कहे,मुझे पता है, माँ, ये तेरी दुआ है,
माँ तेरी दुआ है................
तुम कौन हो?
जो मुझे कमझोर छण में, ताकत दे जाती हो.
तुम कौन हो?
जब ये पुछा, मेने सबसे
उत्तर सुनकर, सोच रहां हूँ में तबसे,
क्योंकि कोई तुझे बहम, कोई कहता, हवा है.
कोई कुछ भी कहे,मुझे पता है, माँ, ये तेरी दुआ है,
माँ तेरी दुआ है................
Tuesday, November 23, 2010
गद्दारी धार्मिक नहीं होती है .

यह कविता मेने बहुत पहले लिखी थी, लेकिन फिर से रवि इन्दर सिंह का
प्रकरण के बाद, दुबारा प्रकाशित कर रहा हूँ.
माधुरी गुप्ता (और अब रवि इन्दर सिंह) की खबर, कल मेने अखबार में पढ़ी.
भावनाए आक्रोश की, अन्दर ही अन्दर इस तरह गढ़ी,
की सबकुछ कम लगने लगा.
हर आई ऍ एस ऑफिसर गदार दिखने लगा.
फिर माँ की, पांचो अंगुली सामान नहीं, वाली बात याद आ गयी.
और पता नहीं किस का, लेकिन क्रोध मत करो, वाली वाणी, मन को भा गयी.
फिर सोचा वो कौन सी मज़बूरी थी, जिससे वो गदार हो गए?
ऐंसा क्या दिया पाकिस्तान ने, जो उनके कदर दार हो गए?
क्यों की गद्दारी का तमका तो, कुछ पार्टियों ने, कुछ बिशेष धर्म वालो को दिया है .
आज हिन्दू और सिख धर्म के गदार निकल गए,
तो अब क्यों उन्होंने अपना मुख सिया है?
मुझे नहीं पता की इन खबरों में कितनी सचाई है.
पर पीठ तो, बड़े बड़े महपुरशो ने भी दिखाई है.
बस हमें पता नहीं चलता है.
ईमान धर्म देख के नहीं,नियत देख कर बदलता है.
Friday, September 17, 2010
किस बात का खुमार मुझ में है.
किस बात का खुमार मुझ में है.
क्यों गुस्सा बेशुमार मुझ में है.
मिला नहीं अभी तक कुछ, औरअभी से उनसे बिछड़ने के दर्द का गुमार, मुझ में है
सपने, हासिल या अपनाना तो दूर कि बात है.
उनसे तकरार मुझ में है.
गम से राफ्ता रहा, मेरा हरदम
और खुशियों के लिए बेकरार दिल, मुझ में है,
खता हुई है कही बार मुझसे भी,
पर उन गलती को स्वीकार करने वाला ईमान, मुझ में है.
दिल बहुत दुखी था, इसलिए लिख रहा हूँ.
पर दुःख को कविता लिख कर भुलाने का, ब्यवहार मुझ में है.
किस बात का खुमार मुझ में है.
क्यों गुस्सा बेसुमार मुझ में है
.
Tuesday, September 14, 2010
खेल खेल खेल.
.
खेल खेल खेल.
एक दूसरे में फोड़ रहे है.
और इस खेल को भारत लाने वाले मणिसंकर,
अब मुह अपना मोड़ रहे है.
कहते है, इस खेल का बेडा गर्क है.
इनमे और हमारे दुश्मनों में क्या फर्क है?
असुविधयो के लिए खेल का बहाना लगाते है.
तीन सालो तक कुछ ना कर पाए, इस राज को छुपाते है.
गुलाम नबी ने तो, डेंगू का कारण देकर, इस खेल का नाम बर्बाद कर दिया.
कलमाड़ी ने खुद कि शाम को आबाद कर दिया.
वाह इस खेल का बजट, हमारी शिक्षा के बराबर करने वाले ये लोग.
खेल खेल खेल.
कर दिया कॉमन वैल्थ गेम फेल.
अब तो सब इसका ठीकरा,एक दूसरे में फोड़ रहे है.
और इस खेल को भारत लाने वाले मणिसंकर,
अब मुह अपना मोड़ रहे है.
कहते है, इस खेल का बेडा गर्क है.
इनमे और हमारे दुश्मनों में क्या फर्क है?
असुविधयो के लिए खेल का बहाना लगाते है.
तीन सालो तक कुछ ना कर पाए, इस राज को छुपाते है.
गुलाम नबी ने तो, डेंगू का कारण देकर, इस खेल का नाम बर्बाद कर दिया.
कलमाड़ी ने खुद कि शाम को आबाद कर दिया.
वाह इस खेल का बजट, हमारी शिक्षा के बराबर करने वाले ये लोग.
जिन्होंने भ्रिस्ठाचार के दैत्य को लगाया खुद भोग.
और अब सारी मलाई खाकर, ख़राब दूध का पनीर बना रहे है.
कुछ समझ नहीं आता है, चुप रहे या कुछ करें.
या फिर इस खेल के नाम पर बढ़ी महंगाई और टेक्स को भरें.
Sunday, August 22, 2010
प्यार सबके दिल में जगाना है.
झील से कमल को.
दृढ़ता से विमल को.
स्वार्थ से प्यार को.चिलमन से दीदार को.
स्वपन से वास्तविकता को.
तुच्छ से व्यापकता को.
जीवन से ईमान को.
और स्वाभिमान को.
झूठ से सचाई को,
बुरे से अच्छाई को.
रात्रि से प्रभात को,
अलगाव से साथ को,
फिर से हमें लड़ाना है.
प्यार सबके दिल में जगाना है.
Tuesday, August 3, 2010
गालियाँ प्रसिद्ध बनाती है?
बिभूति नारायण राय ने
"छिनाल" शब्द का
प्रयोग कर दिया,
और रातो रात
अपने आप को
प्रसिद्ध कर दिया.
पहली बार टी.वी में
राहुल महाजन नहीं बल्कि ,
साहित्य में चर्चा हो रही थी.
कुछ महिलाएं
न्यूज़ चैनेल में रो रही थी.
कि इस राय ने
बहुत घृणित काम किया है
अपने एक लेख में
औरतों को एक
नया नाम दिया है.
हमने सोचा लो
एक छोटे से शब्द ने
राय को काबिल बना दिया.
अक्ष के छितिज को
साहिल बना दिया.
अब अगर प्रसिद्ध होना है,
तो तुम गालियाँ लिखो.
और जितना चाहते हो उतना
साहित्य के बाज़ार में बिको.
पर भाई हम चांसलर नहीं है,
जो किसी पत्रिका में
लेख लिख सके.
और ना ही ब्लागस्पाट में
मेरे इतने पढने वाले है
जो हम भी
चर्चा मंच में दिख सके.
हमें तो कमेन्ट भी
तब मिलते है जब
हम दूसरो को दे आते है.
और क्या पता वो भी
हमारा बदला चुकाने को,
बिना पढ़े "बहुत सुन्दर"
लिख कर चले जातें है.
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